India's Largest Network Of Seekers, Healers & Life Coaches. Join Us Today & Get Connected To Many like Minds.. Attend Life Transforming Events, Workshops On Personal Growth, Courses In Healing Modalities & Spiritual Retreats. 

Wish To Start A NewAge Wellness Center In Your Area? Check out www.NewAgeWellnessWorld.com

 

God in Search of Man or Man in search of God?- Acharya Agyaatadarshan Anand Nath


|| Vande Gurormandalam : Sa-Shaktikayai namo namah ||

|| Vande Gurormandalam : Sa-Shaktikayai namo namah ||

Shivoham!

सब कुछ न कुछ खोज रहे हैं – कोई धन , कोई यश, कोई विद्या, कोई ज्ञान, कोई संबंधों में मिठास, कोई शान्ति तो कोई ईश्वर | स्त्री हो या पुरुष, बाल या वृद्ध सभी अतृप्त हैं – अनंत इच्छाओं से तप्त| यहाँ तक कि नींद में भी जब वे उतरते है तो सुन्दर स्वप्नों की अभिलाषा के साथ| लोगो का जीवन इच्छाओं की पूर्ति की एक दौड़ प्रतीत होती है| सभी इच्छा पूर्ति के लिए सतत कर्म में संलग्न है – घोर कर्म चल रहा है चतुर्दिक, प्रत्येक स्थान पर, प्रति पल| सब दौड़ रहे हैं निरंतर पर दौड़ अंतिम श्वास तक पूरी होती नहीं दीखती – क्यूँकि एक कामना पूर्ण हुई नहीं कि दूसरी सर उठा कर खड़ी हो जाती है और कामनाओं के दंश बहुत पीड़ादायक होते हैं.. वे शांत नहीं बैठने देते, इतना भी समय नहीं देते कि आप एक क्षण के लिए विचार कर सको| परन्तु यह स्वीकार कर लेने के बजाय कि मनुष्य इच्छाओं का सतत प्रहाव है, मृत्यु में वह असंतुष्ट और अतृप्त ही प्रवेश करेगा यह विचार करना नितांत आवश्यक है कि हम कौन हैं? क्या खोजते हैं ? क्यूँ खोजते हैं ? क्या कारण है कि मनवांछित वस्तु, व्यक्ति, लक्ष्यादि प्राप्त होने के बाद भी क्यूँ हमें शान्ति नहीं अनुभव होती? क्या हम वास्तव में वही चाह रहे हैं जिसके पीछे दौड़ रहे हैं? क्या है हमारी अतृप्ति का मूल कारण? और सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रश्न – क्या वांछित तृप्ति संभव भी है और यदि हाँ तो किस प्रकार?
.
मनुष्य की व्याकुलता, उसकी प्रवृत्तियाँ, उसके कर्म सीधा इंगित करते हैं कि मनुष्य जैसा है वैसा अपूर्ण है| परन्तु अगर हम भारतीय मनीषियों के अनुभव को सुने, वेदों में देखें, ज्ञानियों के वचनों ध्यान दें तो एक विरोधाभास उत्पन्न हो जाता है । क्योंकि वे सभी एक मत हो कर कहते हैं कि ‘मनुष्य’ वस्तुतः पूर्ण ही है परन्तु इस सत्य का साक्षात्कार तभी हो सकता है जब वह ‘अज्ञान’ की परतों को भेद ले। पूर्णता सिद्ध करने के निमित्त वह कहते हैं कि इस जगत का मूल अव्यक्त कारण ‘ब्रह्म’ स्वयं में पूर्ण है पूर्णमदः पूर्णमिदम पूर्णात पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिश्य्ते।।’ तो उसका व्यक्त स्वरुप ‘यह जगत’ अपूर्ण कैसे हो सकता है। पर यह साधारण मनुष्य का अनुभव नहीं है – उसको जीवन में, जगत में, व्यक्तियों में, स्थितियों में यहाँ तक कि स्वयं में भी इस पूर्णता की रंचमात्र झलक भी नहीं दीखती। ज्ञानी कहते रहे ‘ईश्वर अंस जीव अविनासी’, शास्त्र प्रतिपादित करते रहें ‘आत्मा अजर-अमर है’ पर उसे तो जीवन के उस छोर पर मृत्यु ही प्रतीक्षा करती प्रतीत होती है। वास्तव में लौकिक मनुष्य के जीवन का सत्य है – मृत्यु का भय, अज्ञान का अन्धकार और दुःख की पीड़ा।
.
जरा और मृत्यु के भय से आक्रांत मानवता चिर-यौवन का ‘अमरत्व’ खोजती है, अपने अंतःकरण के तिमिर को मिटाने  के लिए ‘ज्ञान’ का प्रकाश खोजती है, इस दुःख से भरे खारे सागर में मीठी ओस की बूंदों जैसा ‘आनंद’ तलाशती है। मानव की खोज ;सत-चित-आनंद की खोज है। शास्त्र कहते हैं वो स्रोत जो इस तृष्णा-त्रय का शमन कर सकता है वो – संसार-व्यापार, पद-परिवार में नहीं वरन स्वयं मनुष्य के अंतःकरण में सतत-विद्यमान है- और वह है उसका स्वयं का शुद्धतम स्वरुप-‘आत्मा’। वो कहते हैं कि तुम अपने ही प्रतिबिम्ब को संसार में इधर, उधर ढूँढ़ते फिरते हो। यदि तुम अपने आप का दर्शन कर सको तो पाओगे कि अनंत ज्ञान का प्रकाश, अनन्त जीवन का अमरत्व और अनंत आनंद का चिर-महोत्सव तुम्हारे भीतर ही चल रहा है । शास्त्रों के ये सारगर्भित, सुवासित वचन सुनकर संतोष तो हो सकता है पर संतुष्टि नहीं क्योकि जब तक हमने स्वयं उस रस को नहीं चखा, हमने उसे छक कर नहीं पिया, जब तक हम उस परमतीर्थ के दर्शन न किये – तब तक मन कहता है कि सब शब्दजाल है । कौन जाने आत्मा जैसी कोई चीज होती भी है या नहीं ? तर्क देता है कि संसार सत्य है – शरीर सत्य है, प्रत्यक्ष है । आत्मा कपोलकल्पना है । मन खूब नकारता है पर ह्रदय गवाही देता है कि नहीं! क्यों व्यर्थ नकारते हो सत्य को, यह कोई शब्द-जाल नहीं है हमने देखा है जिस किसी ने भी इस ‘आत्म तत्व’ का साक्षात्कार कर लिया वह मनुष्य-मनुष्य ही नहीं रहा अपितु महामानव-महात्मा हो गया। इतिहास साक्षी है कि ऐसे विश्वजीत पुरुष उस कल्पवृक्ष के समान होते हैं जो न केवल स्वयं इच्छा-पाश से मुक्त होते हैं वरन अपनी छाया में रमने लाखों मनुष्यों को भी कामनाओं के बंधन मुक्ति दिलाते हैं । मन को भी मानना पड़ता हैं – ह्रदय के सत्य के समक्ष मन झुक जाता है अंततः। स्वीकार कर लेता है ‘आत्मा’ की संभावना को ।
.
यह सत्य है कि ‘आत्म-प्रकाशित’ व्यक्ति का आकर्षण अलौकिक होता है। उसके व्यक्तित्व का दिव्य प्रकाश, उसके संवाद, व्यवहार, विचार सब चिल्ला चिल्ला कर शास्त्रो का अनुमोदन करते हैं। शब्द प्रमाण है कि ‘आत्म-तत्व’ के दर्शन होने पर ही मनुष्य को दुःखों और इच्छा-पाश से मुक्ति, जीवन पर नियंत्रण की शक्ति, परम शान्ति, आनंद व रूपांतरण का सामर्थ्य प्राप्त होता है परन्तु यह भी सत्य है कि दृष्टान्तों के माध्यम से; तर्क से या विचारों से हम इस आत्म तत्व को अनुभूत नहीं कर सकते । पुस्तकों में लिखे शब्द हमारा अनुभव नहीं बन सकते । ‘सत-चित-आनंद’ के स्रोत स्वरूप ‘आत्मा’ की खोज के लिए हमें ही प्रयत्न करना होगा परन्तु हमारे भीतर कहाँ छुपा है ‘आत्म – तत्व’? कितनी पर्तों के उघारनी होंगी हमें ? कैसे पहुंचा जाये उस गंतव्य तक, कहाँ से शुरू करें यह ‘अन्तर्यात्रा’?
.
ज्ञानीजन कहते हैं – हम जहाँ खड़े हैं यात्रा वहीँ से शुरू की जा सकती है – हमारी चेतना शरीर पर केन्द्रित है और मन संसार में । ‘तत्व शक्ति विज्ञान’ तंत्रशास्त्र पर आधारित गुरु-शिष्य परम्परा से प्राप्त वह प्रामाणिक विधा है जो चेतना और मन के सांयुज्य और केंद्रीकरण की गुप्त विधियां साधकों को उपलब्ध कराती है। चूंकि तत्व-विधि व ज्ञान गुरुगम्य है व दीक्षोपरान्त ही फलित होता है अतः इस गूढ़ विषय पर चर्चा संभव नहीं है।  यह सत्य है कि शास्त्र सिर्फ सूचना दे सकते हैं – मार्गदर्शन नहीं । पथ प्रदर्शन का काम गुरु का होता है, स्वाभाविक है प्रेमी जिज्ञासु जनो के प्रश्न अवश्य ही उत्तर के पात्र रहेंगे।
.
गुरुमण्डल के शुभाशीष के साथ आज का विराम
.
– आचार्य अज्ञातदर्शन आनंदनाथ

Views: 136

Comment

You need to be a member of The NewAge Foundation to add comments!

Join The NewAge Foundation

© 2019   Created by Sandeep Goswamy.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service